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Anoop Aakash Verma |
Thursday, January 27, 2011
राहुल गांधी जो बोलेंगे उसका बड़ा संदेश जाएगा
7:42 AM
shailendra gupta
Anoop Aakash Verma
New Delhi : India
यह लगभग तय है कि अगला चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा इसलिए समझा जा रहा था कि राहुल गांधी जो बोलेंगे उसका बड़ा संदेश जाएगा। पर राहुल के भाषण में आक्रामकता कम, दार्शनिकता ज्यादा थी। इसलिए अगर सहज भाव में कहा जाये तो पूरे देश से आये नेताओं को मजा नहीं आया। राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं को अवसर देने की बात कही। यही बात कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी कही लेकिन आम कार्यकर्ता आगे कैसे आएगा, इसका फामरूला किसी ने नहीं सुझाया।
कांग्रेस ने अपने तिरासिवें महाधिवेशन में तमाम बड़े विषयों पर या तो चुप्पी साधे रखी या फिर महज रस्म अदायगी के लिए अपने विचार रखे। अलग तेलंगाना राज्य के सम्बंध में इस महीने के आखिरी सप्ताह में जस्टिस श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट आ रही है लेकिन कांग्रेस ने इस पर एक शब्द नहीं बोला। तेलंगानासम्बंधी रिपोर्ट का आंध्र में कांग्रेस की सरकार की स्थिरता पर असर पड़ सकता है। वहां अशांति की आशंका पर कें द्र से अर्धसैनिक बलों की कई टुकड़ियां भेजी जा चुकी है। महाधिवेशन के मंच से कांग्रेस आंध्र प्रदेश के कम से कम अपने नेताओं को शांति बनाये रखने के लिए कह ही सकती थी। यह नहीं किया गया। कांग्रेस के आधा दर्जन से ज्यादा विधायक पार्टी से किनारा कर जगन रेड्डी के साथ जा चुके हैं। दो नवम्बर को एक बड़ी बैठक में सोनिया गांधी ने ऐलान किया था कि गठबंधन धर्म निभाने के मायने ये कदापि नहीं है कि कांग्रेस राज्यों में अपनी ताकत ही नहीं बढ़ाये। बिहार में एकला चलकर अपनी दुगर्ति करा चुकी कांग्रेस की राय गठबंधन को लेकर डेढ़ महीने में ही बदल गयी। स्पेक्ट्रम घोटाला भले ही सहयोगी द्रमुक की देन हो पर महाधिवेशन में गठबंधन पर नुक्ताचीनी करने और अकेले आगे बढ़ने जैसी कोई बात कांग्रेस से कहते नहीं बनी। इस विषय पर कांग्रेस का राजनीतिक प्रस्ताव भी खामोश रहा और सोनिया व राहुल भी चुप ही रहे। राज्यों के जिन नेताओं को बोलने का मौका मिला शायद उन्हें भी ताकीद की गयी थी कि गठबंधन पर जरा जुबान संभालकर ही रहना, लिहाजा कोई नेता गठबंधन वाले राज्यों में अपने बूते आगे बढ़ने की बात नहीं बोला। अगले साल पश्चिम बंगाल और केरल के चुनाव होने हैं लेकिन वामपंथियों के खिलाफ भी पार्टी के किसी बड़े नेता ने कुछ नहीं कहा। राजनीतिक प्रस्ताव में वामपंथी उग्रवाद को कोसने की खानपूर्ति भी रह जाती अगर केरल के नेता रमेश चेन्नीथला और पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मानस भुईंया इसे शामिल करने के लिए दबाव नहीं बनाते। खुले महाधिवेशन से पहले ही पार्टी की बंद दरवाजे वाली बैठक में ये दोनों नेता इस बात पर अड़ गये थे कि ‘आरएसएस को कोसने से क्या फायदा।’ पश्चिम बंगाल व केरल में राजनीति करने के लिए तो वामदलों को कोसने से ही काम चलेगा। आरएसएस व भाजपा को भी सिर्फ महासचिव दिग्विजय सिंह ने ही कोसा; इससे लगा कि शायद यह पार्टी की लाइन न हो। सोनिया गांधी ने आरएसएस और भाजपा की खिंचाई जरूर की लेकिन दोनों में से किसी का नाम नहीं लिया। सोनिया गांधी को पांच साल के लिए अध्यक्ष बनाये जाने से साफ है कि अब कांग्रेस का महाधिवेशन 2014 से पहले नहीं होगा। इसलिए लोकसभा के अगले चुनाव से पहले इतनी बड़ी संख्या में कांग्रेस नेताओं से सोनिया गांधी का संवाद नहीं होने वाला पर महाधिवेशन में ऐसा कुछ नहीं कहा गया जो 2014 के चुनाव में काम आये। यह लगभग तय है कि अगला चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा इसलिए समझा जा रहा था कि राहुल गांधी जो बोलेंगे उसका बड़ा संदेश जाएगा। पर राहुल के भाषण में आक्रामकता कम, दार्शनिकता ज्यादा थी। इसलिए अगर सहज भाव में कहा जाये तो पूरे देश से आये नेताओं को मजा नहीं आया। राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं को अवसर देने की बात कही। यही बात कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी कही लेकिन आम कार्यकर्ता आगे कैसे आएगा, इसका फामरूला किसी ने नहीं सुझाया। राहुल का यशोगान केंद्रीय मंत्री पी.चिदम्बरम,सी.पी. जोशी, दिग्विजय सिंह,ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, दीपेंद्र हुड्डा समेत कई नेताओं ने किया लेकिन हैदराबाद जैसा जोश सभागार में नहीं दिखा। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि सभागार हैदराबाद की तरह ‘डी’ शेप में बना होता तो प्रदेशों से आये नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी के ज्यादा करीब होते। तब संवाद भी ठीक से होता और बाहर से आये, नेताओं में जोश भी दिखता। सोनिया गांधी ने सीटबार भाजपा के खिलाफ जन जागरण करने को कहा है। इसके कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। कहा यह भी जा रहा है कि यह एक तरह से मध्यावधि चुनाव की तैयारी है। जिस तरह से संसद का शीतकालीन सत्र नहीं चला और स्पेक्ट्रम घोटाले पर संयुक्त संसदीय समिति बनाने को लेकर अभी भी विपक्ष अड़ा हुआ है। उससे आगे भी आसार अच्छे नहीं दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का लोक लेखा समिति के सामने पेश होने को शुरू में बड़े दांव के तौर पर देखा गया था लेकिन भाजपा और उसके सहयोगियों ने इसे खारिज कर दिया है। विपक्ष भ्रष्टाचार को लेकर दिल्ली में बड़ी रैली कर चुका है। प्रधानमंत्री व्यथित बताये जाते हैं, यही वजह है कि वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी ने जेपीसी पर एक बार फिर विपक्ष को बातचीत का न्योता दिया। कांग्रेस के प्रस्तावों में भी कुछ खास नहीं था। आर्थिक और विदेश नीति पर आधारित प्रस्तावों में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की प्रशंसा ही ज्यादा थी। राजनीतिक तौर पर कांग्रेस इस महाधिवेशन से कोई विशेष फायदा उठा पाएगी ऐसा लगता नहीं है। संघ और भाजपा पर कांग्रेस के हमलों में भी नया कुछ नहीं है.
अनूप आकाश वर्मा। मूल रूप से उत्तर प्रदेश[सुलतानपुर] के निवासी।प्रारम्भिक शिक्षा सुलतानपुर व लखनऊ में पूर्ण कर राजधानी दिल्ली पहुंचे।जामिया मिल्लिया इसलामिया से पत्रकारिता के छात्र के रूप में फिल्वक्त अध्ययन,निष्पक्ष पत्रकारिता में सक्रिय..कुछ कर गुज़रने की चाह!! राजधानी दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पत्रिका "बेधङक न्यूज़" के सम्पादन व स्वतंत्र लेखन में कार्यरत।आपका ध्येय पत्रकारिता को एक ऐसा मिशन बनाना है जिसमें आम लोगों की छोटी-छोटी ज़रूरतों व मांगों को भी प्रमुखता से देखा जाये।आप सभी से स्नेह,आशीर्वाद व संवाद बनाये रखने की विनम्र गुज़ारिश....